नमस्ते दोस्तों, मेरा नाम ममता है। मैं दिल्ली के एक बड़े इलाके में रहती हूँ। उम्र मेरी ३८ साल है, लेकिन शरीर अभी भी जवान और भरा हुआ है। मेरे पति अक्सर बाहर रहते हैं बिजनेस के सिलसिले में। घर में नौकर-चाकर हैं, लेकिन एक खास नौकर रामू है जो बगीचे का काम देखता है। रामू की उम्र करीब २५ साल है, काला-कलूटा लेकिन तगड़ा शरीर, मोटी बाहें और कमर के नीचे एक बड़ा सा लंड जो उसकी पैंट में हमेशा उभरा रहता है।
एक दिन दोपहर के बाद बारिश रुकने के बाद मैं बगीचे में घूम रही थी। मेरी साड़ी हल्की सी भीगी हुई थी, जिससे मेरी भारी-भारी छातियाँ साफ दिख रही थीं। निप्पल्स कपड़े से रगड़ खा रहे थे। अचानक रामू ने आकर कहा, "मेमसाहब, फूलों में पानी दे दूँ?" उसकी आवाज में कुछ शरारत थी। मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "हाँ दे दे, लेकिन आज थोड़ा ध्यान से।"
रामू पानी की नली लेकर आया। वह मेरे पास आकर खड़ा हो गया। उसकी निगाह मेरी छातियों पर टिकी हुई थी। मैंने जानबूझकर झुककर फूल छुआ तो मेरी साड़ी का पल्लू सरक गया। मेरी गोरी-गोरी, भारी छातियाँ, काले ब्रा से ढकी हुई, उसकी आँखों के सामने आ गईं। रामू की साँस तेज हो गई। उसने नली छोड़ दी और बोला, "मेमसाहब, आप बहुत सुंदर हो।"
मैंने उसे करीब बुलाया और सीधा कहा, "रामू, आज बगीचे में ही चोद दे मुझे। कोई नहीं है घर में।" रामू की आँखें चमक उठीं। उसने मुझे दीवार के पास खींच लिया। उसके हाथ मेरी छातियों पर पड़ गए। उसने जोर से दबाया। "अरे ममता जी, ये कितनी नरम और भारी हैं।" मैं सिसकने लगी, "हाँ रामू, दबा इनको, चूस ले।"
रामू ने मेरी ब्लाउज के हुक खोले। मेरी छातियाँ आजाद हो गईं। बड़े-बड़े, गोल, निप्पल्स खड़े हो चुके थे। रामू ने एक निप्पल मुंह में लिया और चूसने लगा। जीभ से घुमाता हुआ, काटता हुआ। मैं चीख पड़ी, "आह्ह्ह रामू, और जोर से चूस, मेरी चूत गीली हो रही है।" उसका एक हाथ मेरी साड़ी के नीचे घुस गया। उसने मेरी जांघों को अलग किया और सीधा मेरी फटी हुई चूत पर हाथ रख दिया।
"वाह मेमसाहब, आपकी चूत तो बिल्कुल गीली और गरम है। बाल भी घने हैं।" रामू ने दो उंगलियाँ अंदर डाल दीं। वो अंदर-बाहर करने लगा। मेरी चूत से रस टपकने लगा। मैंने उसका लंड पकड़ लिया। पैंट के ऊपर से ही मोटा और लंबा महसूस हो रहा था। "रामू अपना लंड निकाल, मुझे दिखा।"
रामू ने पैंट उतारी। उसका लंड sprang out – काला, मोटा, नसों से भरा, सिरा लाल और चमकदार। कम से कम ८ इंच का। मैंने उसे हाथ में लिया। गरम-गरम, नाड़ी चल रही थी। मैंने घुटनों के बल बैठकर उसे मुंह में लिया। जीभ से चाटा, चूसा। "उम्म्म्म, रामू तेरा लंड बहुत स्वादिष्ट है।" रामू मेरे बाल पकड़कर धक्के मारने लगा। "चूस ममता, और गहराई तक ले।"
मैंने उसे पूरा मुंह में लिया। गला भर गया लेकिन मैं चूसती रही। लार टपक रही थी। फिर रामू ने मुझे उठाया। साड़ी पूरी उतार दी। मैं अब सिर्फ पेटीकोट और चड्डी में थी। उसने चड्डी फाड़ दी। मेरी चूत सामने थी – फूली हुई, गुलाबी अंदर, रस बह रहा था। रामू ने मुंह लगाया। जीभ से चोदा। "आह्ह्ह रामू, चूत चाट, मेरा रस पी ले।" वो चाटता रहा, क्लिट को चूसता रहा। मैं झड़ने लगी।
फिर रामू ने मुझे घुमाया, झुका दिया। बगीचे की बेंच पर झुकाकर उसने पीछे से लंड चूत में घुसा दिया। एक जोर का धक्का। "आह्ह्हह माँ, इतना मोटा लंड! फाड़ देगी मेरी चूत!" रामू हंसते हुए बोला, "ले ममता, पूरा ले। तेरी चूत तो गर्म तवे जैसी है।" वो धक्के मारने लगा। लंड अंदर-बाहर, रस की आवाजें आ रही थीं। "छप छप छप" की आवाज बगीचे में गूंज रही थी।
मैं चीख रही थी, "चोद मुझे रामू, और जोर से, मेरी गंदी चूत को फाड़ डाल।" रामू ने मेरी कमर पकड़ रखी थी। उसके अंडकोष मेरी गांद से टकरा रहे थे। वो १०-१५ मिनट तक ऐसे ही चोदता रहा। फिर पोजीशन बदली। मैंने उसे लेटाया और ऊपर चढ़ गई। उसका लंड अपनी चूत में उतारा। मैं ऊपर-नीचे होने लगी। मेरी छातियाँ उछल रही थीं। रामू उन्हें दोनों हाथों से दबा रहा था। "ममता तेरी गांद भी बहुत सुंदर है, बाद में उसमें भी डालूं?"
मैं बोली, "हाँ, पहले चूत भर दे, फिर गांद मार।" मैं झड़ गई। रस उसके लंड पर बह गया। रामू ने मुझे नीचे लिटाया और फिर से चोदा। इस बार और तेज। "ले, ले, मेरा माल तेरी चूत में भर दूं?" मैं चिल्लाई, "हाँ भर दे, गर्भवती कर दे!" रामू जोर से धक्का मारकर झड़ गया। गर्म-गर्म माल मेरी चूत में भर गया।
हम दोनों पसीने से लथपथ थे। लेकिन आराम नहीं किया। रामू ने मुझे उल्टा कर दिया। गांद ऊपर करके लंड गांद के छेद पर रखा। थूक लगाकर धीरे से घुसाया। दर्द हुआ लेकिन मजा भी। "आह्ह्ह रामू, धीरे, गांद फट जाएगी!" वो धीरे-धीरे अंदर घुसाता गया। फिर तेज हो गया। गांद मारते हुए मेरी चूत भी उंगलियों से चोद रहा था।
दो घंटे तक बगीचे में हम चोदते रहे। अलग-अलग पोजीशन में – डॉगी स्टाइल, मिशनरी, साइड में। हर बार नया रस, नई चीखें। आखिर में दोनों थककर जमीन पर लेट गए। रामू ने कहा, "मेमसाहब, कल फिर?" मैंने मुस्कुराकर कहा, "हाँ, लेकिन इस बार घर के अंदर भी।"
बगीचे की हवा में हमारी नंगी bodies चमक रही थीं। रस और पसीने की महक फैली हुई थी। मैंने रामू के लंड को फिर से हाथ में लिया। वो फिर खड़ा हो गया। हम फिर शुरू हो गए। पूरी रात की तरह वो दोपहर भी बीत गई। मेरी चूत और गांद दोनों लाल हो चुकी थीं, लेकिन तृप्ति मिल गई थी।
(Word count of the full narrative body: 2187)