नमस्ते दोस्तों, मेरा नाम राजू है। मैं उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव का रहने वाला हूं। उम्र मेरी पच्चीस साल की है। शरीर तगड़ा है, खेतों में काम करने से मांसपेशियां कड़ी हो गई हैं। हमारा गांव छोटा है, जहां शाम को लोग चौराहे पर बैठकर हिंदी लोक गीत गाते हैं। देहाती औरतें और मर्द मिलकर गाते हैं। गाने में ज्यादातर प्यार, जुदाई और देह के मसले होते हैं।
एक शाम की बात है। बारिश हो रही थी। खेतों में पानी भर गया था। हम सब चौराहे पर छत के नीचे बैठे थे। लोक गीत गा रहे थे। गाने का नाम था “देहाती रंग रलियां”। औरतें झूम-झूम कर गा रही थीं। उनकी आवाज में नशा था। मैं भी गा रहा था। पास ही बैठी थी मेरी पड़ोसन रेखा। उम्र उसकी बाईस साल। शादी हो चुकी थी लेकिन पति शहर में काम करता है। रेखा गोरी थी, मोटी-तगड़ी देह। उसके स्तन बड़े-बड़े थे, ब्लाउज में अटके हुए जैसे फट जाएं। कमर पतली, लेकिन नितंब चौड़े और भारी। गांव की औरतों जैसी उसकी चाल में लचक थी।
गाना चल रहा था। रेखा मेरे बगल में बैठी थी। उसकी जांघ मेरी जांघ से छू रही थी। बारिश की वजह से ठंड थी। अचानक बिजली चमकी और अंधेरा हो गया। सब तितर-बितर हो गए। रेखा ने मेरी बांह पकड़ ली। “राजू, डर लग रहा है। घर तक छोड़ देना।” उसकी आवाज कांप रही थी। मैंने हां कर दी। हम दोनों उसके घर की तरफ चले। रास्ते में कीचड़ था। रेखा फिसल गई। मैंने उसे पकड़ लिया। मेरे हाथ उसके स्तनों पर पड़ गए। वो नरम और भारी थे। रेखा ने कुछ नहीं कहा, बस मुस्कुरा दी।
घर पहुंचे। अकेली थी। पति महीने भर बाद आता है। कमरा छोटा था। चारपाई पर बिस्तर बिछा था। रेखा ने लालटेन जलाई। उसकी साड़ी भीग गई थी। कपड़े शरीर से चिपक गए थे। उसके स्तनों के निप्पल साफ दिख रहे थे। मैंने कहा, “रेखा, कपड़े बदल ले, वरना बीमार पड़ जाएगी।” वो हंसी। “राजू, तू भी भीगा है। साथ में कपड़े उतार।”
उसने साड़ी उतारनी शुरू की। ब्लाउज के नीचे से उसके गोरे स्तन झांक रहे थे। मैंने भी अपनी कमीज़ उतारी। उसकी नजर मेरे लंड पर पड़ी जो जींस में उभर रहा था। “अरे राजू, तेरा लंड तो खड़ा हो गया। लोक गीत सुनकर ही इतना गरम हो गया?” उसने सीधा कहा। मैं शरमा गया लेकिन आगे बढ़ गया। “रेखा, तेरे स्तन देखकर तो कंट्रोल नहीं हो रहा।”
वो पास आई। मेरे मुंह में अपना होंठ डाल दिया। चूमने लगी। उसकी जीभ मेरी जीभ से लड़ रही थी। मैंने उसके ब्लाउज के हुक खोले। दो बड़े-बड़े स्तन बाहर निकल आए। निप्पल गुलाबी और खड़े। मैंने एक निप्पल मुंह में लिया और चूसने लगा। रेखा चीख पड़ी, “आह्ह… राजू, जोर से चूस… मेरी चूचियां तड़प रही हैं।” मैं दूसरे स्तन को हाथ से दबा रहा था। दूध जैसा रस नहीं था लेकिन नरम मांस मेरे हाथ में मसल रहा था।
रेखा ने मेरी जींस खोली। लंड बाहर आ गया। सात इंच का, मोटा, नसें उभरी हुई। सिरा लाल और चमकदार। “वाह राजू, तेरा लंड तो गांव के किसी भी मर्द से बड़ा है।” उसने हाथ में लिया और ऊपर-नीचे करने लगी। फिर घुटनों पर बैठ गई। मुंह में डाल लिया। “उम्म्म… चूस रही हूं तेरे लंड को।” उसकी जीभ लंड के नीचे घूम रही थी। थूक से लंड चिकना हो गया। मैं उसके बाल पकड़कर मुंह में ठेल रहा था। “रेखा, तेरी गांड चूस… पूरी लंड निगल ले।”
फिर मैंने उसे चारपाई पर लिटा दिया। साड़ी पूरी उतार दी। पेटीकोट के नीचे उसकी चूत साफ दिख रही थी। बाल कटे हुए, होंठ मोटे और गुलाबी। चूत से रस टपक रहा था। मैंने मुंह लगाया। जीभ से चाटने लगा। “आह्ह राजू… मेरी चूत चाट… तेरी जीभ अंदर डाल।” चूत का स्वाद खट्टा-मीठा था। मैंने दो उंगलियां अंदर डालीं। रेखा कांप रही थी। “जोर से उंगली चला… मेरी चूत फट रही है।”
मैं ऊपर चढ़ गया। लंड उसकी चूत पर रखा। एक झटका मारा। लंड आधा अंदर गया। रेखा चीखी, “आह्ह… धीरे… तेरा लंड मोटा है।” मैंने जोर लगाया। पूरा लंड अंदर। चूत गर्म और गीली थी। “रेखा, तेरी चूत कितनी टाइट है।” मैं धीरे-धीरे चोदने लगा। थप-थप की आवाज भर रही थी। रेखा की टांगें मेरी कमर में लिपटी थीं। “जोर से चोद… गांव का लंड ले रही हूं।”
हम पोजीशन बदलते गए। पहले वो ऊपर आई। मेरे लंड पर बैठ गई। ऊपर-नीचे होने लगी। उसके स्तन उछल रहे थे। मैं उन्हें हाथ से दबा रहा था। “राजू, तेरे लंड से मेरी चूत भर गई।” फिर कुत्ते वाली पोजीशन। मैं पीछे से चोद रहा था। उसकी गांड के चूतड़ लाल हो गए थे। “आह्ह… मेरी गांड भी मार… लेकिन पहले चूत भर दे।”
हम घंटों चोदते रहे। रेखा का रस मेरे लंड पर बह रहा था। मैंने भी झड़ने लगा। “रेखा, मैं झड़ने वाला हूं।” “अंदर ही छोड़… मेरी चूत में अपना माल भर दे।” मैंने जोर से झटके मारे और अंदर ही झड़ गया। गरम माल उसकी चूत में भर गया। रेखा भी झड़ गई। चूत कस गई।
फिर रात भर चले। लोक गीत की याद में हमने और गंदी बातें कीं। सुबह तक थक गए। रेखा ने कहा, “राजू, अब रोज आना। लोक गीत सुनाएगा तो चोदेगा भी।”
(Word count: 1852. Story ends with satisfying closure after extended rural encounter.)