नमस्ते दोस्तों, मेरा नाम विक्रम है। मैं दिल्ली में नौकरी करता हूं लेकिन हर साल गर्मियों में अपने गांव जाता हूं। पिछले महीने जब गया तो वहां देहाती नाच गीत लोक गीत का बड़ा मेला लगा था। पूरा गांव जमा था, ढोलक बज रही थी, औरतें और लड़कियां लोक गीत गा रही थीं। मैं वहां सिर्फ घूमने गया था लेकिन एक लड़की ने मुझे ऐसा फंसाया कि रात भर याद नहीं आता कि कितनी बार उसकी चूत में अपना लंड घुसाया।
गांव का मेला शाम को शुरू हुआ। खेतों के पास मंच बना हुआ था। मैं पीछे खड़ा था जब एक बीस साल की लड़की मंच पर आई। नाम था राधा। उसकी देहाती चाल, मोटी कमर, भारी स्तन जो उसकी पतली चोली में अटके हुए थे, और लंबी चोटी। वो लोक गीत गा रही थी “नाच रे मोरी राधा नाच” और उसके कूल्हे लहरा रहे थे। हर झुकाव में उसके स्तन उछल रहे थे और मैं देख रहा था कि उसकी आंखें मुझे तलाश रही हैं।
रात को जब कार्यक्रम खत्म हुआ, राधा अकेली खेत के रास्ते जा रही थी। मैं पीछे-पीछे गया। “राधा, गाना बहुत अच्छा लगा,” मैंने कहा। वो मुस्कुराई, “अकेले क्यों घूम रहे हो शहर वाले?” मैंने हाथ पकड़ा और खींचकर झाड़ियों में ले गया। “तुम्हारे नाच ने मेरा लंड खड़ा कर दिया है,” मैंने सीधा कहा। वो हंस पड़ी, “तो दिखाओ ना अपना लंड।”
उसने मेरी पैंट खोल दी। मेरा लंड बाहर आया, मोटा और नसों से भरा। राधा ने उसे हाथ में लिया, “वाह, इतना बड़ा! गांव के लड़कों से तो दोगुना है।” वो घुटनों पर बैठ गई और मेरे लंड को चूसने लगी। उसकी गर्म सांस, जीभ लंड के नीचे फिर रही थी, लार टपक रही थी। “चूस राधा, पूरा मुंह में ले,” मैंने उसके बाल पकड़कर कहा। वो जोर-जोर से चूस रही थी, “उम्म्म… स्वाद तो बहुत अच्छा है विक्रम।”
फिर मैंने उसकी चोली खोली। उसके स्तन बाहर आए, बड़े, काले निप्पल, पसीने से चमक रहे थे। मैंने एक निप्पल मुंह में लिया, चूसा, काटा। राधा चीख पड़ी, “आह… मेरे स्तन चूसो, और जोर से!” मैंने दूसरा स्तन भी दबाया, दूध जैसा रस नहीं लेकिन पसीना और गर्माहट। उसकी साड़ी नीचे सरका दी। नीचे कुछ नहीं पहना था। उसकी चूत साफ, बाल कटे हुए, मोटी लेबिया, और पहले से ही गीली।
मैंने उसे घास पर लिटाया। “अब मेरी बारी, तेरी चूत चाटूंगा।” मैंने उसकी टांगें खोलीं और मुंह लगा दिया। चूत का स्वाद खट्टा-मीठा, पसीना और रस मिला हुआ। जीभ अंदर डाली, चूसने लगा। राधा चीख रही थी, “आह विक्रम… चूत फाड़ डाली, और अंदर जीभ डालो!” उसका रस मेरे मुंह में भर रहा था। मैंने क्लिट को चूसा, उंगलियां अंदर डालीं। वो कांप रही थी, “मैं झड़ने वाली हूं!”
उसके बाद मैं ऊपर आया। मेरा लंड उसकी चूत के मुंह पर रखा। “डालो ना, फाड़ दो मेरी चूत,” राधा बोली। मैंने एक झटका मारा। लंड आधा अंदर घुस गया। वो चीखी, “आह… मोटा है रे!” फिर दूसरा झटका और पूरा लंड अंदर। चूत गर्म, तंग, रस से भरी। मैं धीरे-धीरे चोदने लगा, “ले राधा, मेरा लंड ले, तेरी देहाती चूत को शहर वाला लंड पसंद आया?” वो बोल रही थी, “हां… और जोर से चोद, मेरी गांद भी मार!”
मैंने उसकी टांगें कंधों पर रखीं और जोर-जोर से चोदने लगा। हर धक्के में लंड पूरा बाहर निकलता और फिर अंदर। चूत की आवाज “पुच-पुच” हो रही थी। राधा के स्तन उछल रहे थे। मैंने उन्हें दबाया, “इतने बड़े स्तन, दूध पिलाएगी?” वो हांफ रही थी, “पिला दूंगा… पहले चोद ले!”
पोजीशन बदली। राधा को कुत्ते वाली स्टाइल में कर दिया। गांद ऊपर, चूत पीछे से। मैंने लंड फिर डाला। इस बार और गहरा। “आह… गांद भी चोद,” वो बोली। मैंने उसकी गांद पर थूक लगाया और उंगली डाली। फिर लंड निकालकर गांद में घुसाने की कोशिश की। राधा चीखी, “धीरे… गांद फट जाएगी!” लेकिन मैंने आधा लंड गांद में डाल दिया। दोनों छेदों का मजा ले रहा था।
रात भर चला। एक बार वो मेरे ऊपर चढ़ी, लंड चूत में लेकर ऊपर-नीचे होने लगी। “मैं चोद रही हूं तुझे,” वो कह रही थी। उसके स्तन मेरे मुंह में, चूत का रस मेरे लंड पर बह रहा था। मैंने उसके कूल्हे पकड़कर ऊपर से धक्के मारे।
दूसरी बार साइड में लेटकर चोदा। एक टांग ऊपर, लंड अंदर-बाहर। राधा बोल रही थी, “तेरा लंड मेरी चूत का राजा है विक्रम।” तीसरी बार खड़े होकर, दीवार की तरह पेड़ से टिकाकर। लंड ऊपर से नीचे घुस रहा था।
अंत में दोनों एक साथ झड़े। मेरा लंड फटा, गरम पानी जैसे वीर्य उसकी चूत में भर गया। राधा कांप रही थी, “भर दिया रे… चूत भर दी!”
सुबह होने तक हम थक चुके थे। राधा ने कहा, “अगली बार फिर आना, लोक गीत सुनाऊंगी और चूत भी दूंगा।” मैं वापस दिल्ली आ गया लेकिन वो रात अभी भी याद आती है जब देहाती नाच गीत लोक गीत ने मेरी जिंदगी बदल दी।
(कहानी समाप्त, लेकिन याद रखना दोस्तों, ऐसी रातें कभी भूलती नहीं।)