नमस्ते दोस्तों, मेरा नाम विकास है। मैं दिल्ली में एक छोटी सी जॉब करता हूँ, लेकिन हर साल गर्मियों में अपने गाँव जाता हूँ। इस बार जब मैं पहुँचा तो सब कुछ पुराना लग रहा था, पर एक नई बात थी। मेरे चाचा के यहाँ एक नई लड़की काम करती थी, नाम था रेखा। देहाती, बीस साल की, गाँव की मिट्टी जैसी महक, लेकिन शरीर ऐसा कि देखते ही लंड खड़ा हो जाए। काली-काली आँखें, मोटी मोटी जाँघें, और छाती पर दो बड़े-बड़े स्तन जो टी-शर्ट में भी फटते लगते थे।
पहले दिन जब मैं घर पहुँचा, रेखा पानी ला रही थी। उसकी कमर झुकने पर उसकी गोल-गोल गांड साफ दिख रही थी। मैंने सोचा, यही तो dehati remix है। शहर की लड़कियाँ तो सीधी हैं, लेकिन गाँव वाली ऐसी होती हैं कि एक बार चोदो तो भूल नहीं पाते। रात को खाना खाते समय उसकी नजर मुझ पर पड़ी। मैंने इशारा किया, वो मुस्कुरा दी।
अगली शाम जब सब सो गए, मैं छत पर गया। रेखा भी वहाँ कपड़े सुखा रही थी। अकेले में मैंने पूछा, “रेखा, गाँव में कितने दिन से हो?” वो बोली, “दो महीने हुए, भैया।” मैंने उसके पास जाकर कहा, “मुझे भैया मत बोलो, नाम से बुलाओ।” वो शरमा गई। मैंने उसका हाथ पकड़ा और खींचा। “विकास भाई, कोई देख लेगा।” मैंने कहा, “कोई नहीं है।”
मैंने उसके स्तनों पर हाथ रखा। इतने नरम और भारी कि दोनों हाथों में भी नहीं समाते। मैंने उसकी टी-शर्ट ऊपर की और ब्रा के अंदर हाथ डाला। उसके निप्पल पहले से ही खड़े थे। “अरे, कितने सख्त हैं तेरे स्तन।” वो साँस लेते हुए बोली, “चुपचाप करो ना, जल्दी।” मैंने उसकी ब्रा उतारी और मुँह लगा दिया। एक स्तन चूसता, दूसरा हाथ से दबाता। रेखा की साँस तेज हो गई। “आह्ह… विकास… चूसो और जोर से।”
मैंने उसकी साड़ी खोल दी। अंदर कोई पैंटी नहीं थी। उसकी चूत पहले से ही गीली थी। उंगलियाँ डाली तो चिपचिपा रस निकल रहा था। “रेखा, तेरी चूत कितनी गर्म है।” मैंने दो उंगलियाँ अंदर डालीं और घुमाने लगा। वो कराह रही थी, “हाँ… उँगलियाँ और अंदर… फाड़ दो मेरी चूत को।” मैंने घुटनों पर बैठकर उसकी चूत चाटनी शुरू की। जीभ से क्लिटोरिस को चाटते हुए अंदर तक जीभ डाली। रस का स्वाद खट्टा-मीठा था। रेखा मेरे बाल पकड़कर दबा रही थी, “चाटो… पूरी चूत चाट लो… मैं झड़ने वाली हूँ।”
उसने मुझे खड़ा किया और मेरी पैंट खोली। मेरा लंड बाहर आया, सात इंच का मोटा लंड। वो हैरान हो गई, “अरे, शहर वाला लंड तो इतना बड़ा होता है!” उसने हाथ में लिया और ऊपर-नीचे करने लगी। फिर मुँह में ले लिया। गर्म-गर्म चूस रही थी, जीभ घुमाते हुए। “रेखा, तेरे होंठों में मेरा लंड बहुत अच्छा लग रहा है।” वो गले तक ले गई, गले से आवाज आ रही थी। मैंने उसके सिर को पकड़कर धक्के मारे।
फिर मैंने उसे दीवार से लगाया। उसकी एक टाँग उठाई और लंड चूत पर रखा। “अंदर डालो ना… फाड़ दो मेरी देहाती चूत।” एक जोर का धक्का मारा। आधा लंड अंदर चला गया। वो चीख पड़ी, “आह्ह्ह… मर गई… इतना मोटा है!” मैंने धीरे-धीरे और जोर से धक्के शुरू किए। पूरी चूत में लंड घुसा रहा था। थप-थप की आवाजें छत पर गूँज रही थीं। रेखा की गांड हिल रही थी। मैंने उसकी गांड पर थप्पड़ मारे, “ले… ले मेरे लंड की देहाती रीमिक्स!”
हमने पोजीशन बदली। वो ऊपर बैठ गई। उसकी चूत में लंड डालकर वो ऊपर-नीचे होने लगी। उसके स्तन उछल रहे थे। मैं दोनों हाथों से दबा रहा था। “विकास… तेरे लंड से मेरी चूत फट रही है… और जोर से चोदो!” वो झड़ गई, गरम-गरम रस मेरे लंड पर बह रहा था। मैंने भी जोर से धक्का मारा और अंदर झड़ गया। गरम वीर्य उसकी चूत भर गया।
रात को हम दो बार और चोदे। सुबह तक उसकी चूत लाल हो गई थी। अगले दिनों में हम खेत में, कुएँ के पास, और स्टोर रूम में भी चोदते रहे। रेखा अब मेरी देहाती रीमिक्स बन गई थी। हर बार वो नई-नई बातें करती, “अब मेरी गांड भी मारो ना।” मैंने उसकी गांड में लंड डाला, वो चीखती रही लेकिन मजे लेती रही।
इस गाँव की यात्रा ने मुझे नई ऊर्जा दी। रेखा अब हर शाम इंतजार करती। देहाती remix सच में सबसे हॉट होती है।