नमस्ते दोस्तों, मेरा नाम राहुल है। मैं दिल्ली में नौकरी करता हूँ लेकिन हर साल गर्मियों में अपने गांव उत्तर प्रदेश के एक छोटे से देहात में जाता हूँ। पिछले महीने जब मैं गांव गया तो वहाँ देहाती नाच के गाने लोकगीत का कार्यक्रम था। रात के अंधेरे में खेतों के पास मंच बना हुआ था, ढोलक और हारमोनियम बज रहे थे और औरतें-मर्द मिलकर जोर-जोर से लोकगीत गा रहे थे। मैं भी वहाँ पहुँच गया। भीड़ में एक औरत मेरी नजरों में अटक गई। नाम था राधा, उम्र करीब ३२ साल, देहाती औरत लेकिन शरीर ऐसा कि देखते ही लंड खड़ा हो जाए। मोटी-मोटी जांघें, बड़ी-बड़ी छातियाँ जो ब्लाउज में फटने को तैयार हों, गोल-गोल गांड और काली-काली आँखें। वो भी मुझे देख रही थी।
लोकगीत चल रहा था – “राम मिलाए जोड़ी, नाचो रे नाचो”। औरतें कमर हिला-हिलाकर नाच रही थीं, राधा भी नाच रही थी। उसके स्तन ऊपर-नीचे उछल रहे थे, पसीने से ब्लाउज भीग रहा था। मैं पास जाकर खड़ा हो गया। राधा ने मुझे देखा और मुस्कुराई। गाने के बीच उसने कान में फुसफुसाया, “राहुल भैया, रात को खेत के पीछे मिलना, अकेले में बात करनी है।” मेरा लंड तुरंत खड़ा हो गया।
रात के दो बजे के आसपास मैं खेत के पीछे पहुँचा। राधा पहले से वहाँ थी। अंधेरा था लेकिन चाँदनी में उसका शरीर साफ दिख रहा था। उसने साड़ी उतार दी थी, सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज में खड़ी थी। “राहुल, देहाती नाच के गाने सुनते-सुनते मन में आग लग गई। अब तू मुझे बुझा,” वो बोली और सीधे मेरे पास आ गई। मैंने उसे खींचा और जोर से चूमने लगा। उसके होंठ नरम थे, जीभ अंदर डालकर चूसने लगा। राधा भी मेरी जीभ चूस रही थी, “आह्ह… चूस ले, पूरा चूस ले मेरे होंठ।”
मैंने उसका ब्लाउज खोला। दो बड़ी-बड़ी छातियाँ बाहर निकल आईं, काले-काले निप्पल खड़े थे। मैंने एक चूचक मुंह में लिया और जोर-जोर से चूसने लगा। “हाँ राहुल, दाँतों से काट, दर्द दे, मेरी छाती चूस ले पूरी,” राधा चीख रही थी। मैं दूसरी छाती भी चूस रहा था, हाथ से गांड सहला रहा था। पेटीकोट के नीचे हाथ डाला तो पता चला कि वो कुछ भी नहीं पहने हुई थी, सीधी नंगी गांड और गीली-गीली चूत हाथ में आ गई। उंगलियाँ अंदर डाली तो रस बह रहा था। “अरे वाह राधा, तेरी चूत तो पूरी तरल हो गई है,” मैं बोला। “हाँ, लोकगीत सुनते-सुनते ही बह गई थी, अब तेरे लंड से भर दे इसे,” वो बोली।
मैंने अपनी पैंट उतारी। लंड खड़ा होकर फड़फड़ा रहा था। राधा ने तुरंत घुटनों के बल बैठकर लंड मुंह में लिया। “चूसती हूँ तेरा मोटा लंड,” और वो जोर-जोर से चूसने लगी। थूक से लंड गीला हो गया, वो गले तक ले रही थी। “गले में ले, राधा, पूरा खा ले मेरा लंड,” मैं उसके बाल पकड़कर धक्के दे रहा था। वो गले से “ग्लुक-ग्लुक” की आवाजें निकाल रही थी। पाँच मिनट चूसने के बाद वो बोली, “अब चोद मुझे, खेत में ही लिटा के चोद।”
मैंने उसे घास पर लिटाया। पेटीकोट ऊपर किया, टाँगें फैलाईं। चूत गुलाबी और बालों से घिरी हुई थी, रस टपक रहा था। मैंने लंड सेट किया और एक जोरदार झटका मारा। “आह्ह्ह… फट गई मेरी चूत,” राधा चीखी। लंड आधा अंदर गया। दूसरा झटका – पूरा लंड अंदर। अब मैं जोर-जोर से चोदने लगा। “ले, ले मेरा लंड, तेरी देहाती चूत फाड़ दूँगा,” मैं बोल रहा था। राधा भी कमर उठा-उठाकर चुदवा रही थी। “हाँ, और जोर से चोद, लोकगीत की तरह धम-धम करके चोद।”
हम पाँच मिनट उसी पोजीशन में चोदते रहे। फिर राधा ने मुझे लिटाया और खुद ऊपर चढ़ गई। “अब मैं नाचूंगी तेरे लंड पर,” वो बोली और कमर हिलाने लगी। उसकी छातियाँ मेरे मुंह के पास आ रही थीं, मैं चूस रहा था। वो ऊपर-नीचे हो रही थी, “आह्ह… लंड मेरी चूत में घुस रहा है, कितना मोटा है तेरा।” मैं उसकी गांड सहला रहा था, उंगली गांड के छेद में डाल दी। “नहीं राहुल, गांड मत छेड़ अभी, पहले चूत फाड़,” वो बोली लेकिन मैंने दो उंगलियाँ अंदर कर दीं।
फिर मैंने उसे कुत्ते वाली पोजीशन में कर दिया। पीछे से लंड डाला। “ये ले, तेरी गांड मारता हूँ,” लेकिन पहले चूत ही चोद रहा था। हाथ से उसकी छाती पकड़कर जोर-जोर से धक्के मार रहा था। “थप-थप” की आवाजें खेत में गूंज रही थीं। राधा चीख रही थी, “मार, मार मेरी चूत, पूरा लंड अंदर डाल।” मैंने रफ्तार बढ़ा दी। पसीना दोनों के शरीर पर बह रहा था।
दस मिनट बाद राधा का शरीर काँपने लगा। “आ रहा है, मेरा पानी निकल रहा है,” और वो झड़ गई। चूत से रस निकलकर मेरे लंड पर बह रहा था। मैंने भी जोर मारा और अंदर ही झड़ गया। “ले, ले मेरा गरम पानी तेरी चूत में,” लंड फड़फड़ाया और बीज अंदर भर दिया।
लेकिन रात अभी खत्म नहीं हुई थी। थोड़ी देर बाद लंड फिर खड़ा हो गया। राधा ने कहा, “अब मेरी गांड मार।” मैंने थूक लगाकर गांड के छेद पर लंड रखा और धीरे से दबाया। “आह्ह… दर्द हो रहा है,” वो चीखी लेकिन मैंने जोर लगाया। आधा लंड गांड में घुस गया। “धीरे, राहुल, लेकिन चोद,” वो बोली। मैं धीरे-धीरे अंदर-बाहर करने लगा। फिर रफ्तार बढ़ाई। “ले, तेरी गांड फाड़ दी,” मैं बोल रहा था। राधा भी कमर हिला रही थी। “हाँ, गांड भी फाड़ दे, लोकगीत सुनते-सुनते मन कर रहा था किसी से गांड मारवाने का।”
हम घंटे भर चोदते रहे। अलग-अलग पोजीशन – खड़े होकर, बैठकर, 69 पोजीशन में चूत चाटना, लंड चूसना। राधा ने मेरा लंड चूसा और मैंने उसकी चूत चाटी, रस पीया। “तेरी चूत का स्वाद बहुत मीठा है,” मैं बोला। “और तेरे लंड का स्वाद नमकीन,” वो बोली।
सुबह होने से पहले हम थककर गिर पड़े। राधा ने कहा, “कल फिर मिलना, अगला लोकगीत नाच होगा।” मैंने वादा किया। गांव लौटकर भी याद आती है वो रात – देहाती नाच के गाने, राधा की चूत और गांड, सब कुछ।
(कहानी को पूरा विस्तार देने के लिए आगे और सीन जोड़े जा सकते हैं जैसे सुबह की दूसरी चुदाई, गांव की और औरतों का जिक्र, लेकिन मूल घटना यही थी। पूरी रात के हर झटके, हर चीख, हर रस की बूंद का वर्णन इसी तरह विस्तार से किया जा सकता है ताकि पाठक को पूरा मजा आए।)