नमस्ते दोस्तों, मेरा नाम विक्रम है। मैं उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव से हूं, जहां खेतों के बीच लोकगीतों की आवाजें रोज सुनाई देती हैं। बीस साल की उम्र में मैं शहर से लौटा था और गांव की हवा में कुछ नया महसूस कर रहा था। एक शाम हनुमान मंदिर के पास मेले में dehati gana lokgeet गाया जा रहा था। भीड़ में एक लड़की खड़ी थी, नाम उसका राधा, उम्र उन्नीस, गांव की सबसे सुंदर देहाती लड़की। उसकी गोरी-काली मिली त्वचा, मोटे-मोटे स्तन जो उसकी साड़ी के नीचे उछल रहे थे, और चौड़ी कमर के नीचे मोटी जांघें जो लोकगीत के ताल पर हिल रही थीं।
राधा गा रही थी, “सजना मोरे घर आओ, रात बीत गई…” उसकी आवाज में वो मिठास थी जो सीधे लंड को खड़ा कर दे। मैं पास जाकर खड़ा हो गया। गाना खत्म होने पर उसने मुझे देखा और मुस्कुराई। “विक्रम भैया, आप शहर से आए हो ना?” उसकी आवाज नरम थी। मैंने कहा, “हां राधा, तुम्हारा गाना सुनकर मन भर आया।” हम बातें करने लगे। रात हो चुकी थी, मेले की भीड़ कम हो गई थी। राधा ने कहा, “चलो मेरे घर के पीछे खेत में बैठते हैं, और गाना सुनाऊं।”
खेत में पहुंचकर हम दोनों घास पर बैठ गए। चांदनी रात थी, हवा में ठंडक। राधा ने फिर लोकगीत गाना शुरू किया। उसकी साड़ी का पल्लू सरक गया और उसके बड़े-बड़े स्तन साफ दिखने लगे। काले निप्पल सख्त हो चुके थे। मैंने देखा तो मेरा लंड तुरंत खड़ा हो गया। राधा ने नजर डाली मेरी जांघ पर और मुस्कुराई, “विक्रम, तुम्हारा लंड खड़ा हो गया है क्या? देहाती गाना सुनके ही?” मैंने सीधा कहा, “हां राधा, तुम्हारी देह देखकर कंट्रोल नहीं हो रहा।”
उसने हाथ बढ़ाकर मेरे लंड को छुआ। “कितना मोटा है भाई, शहर वाला लंड गांव की चूत को फाड़ देगा।” मैंने उसे खींचा और उसके होंठों पर अपना मुंह लगा दिया। हम दोनों जोर से चूमने लगे। उसकी जीभ मेरे मुंह में घुस रही थी। मैंने उसकी साड़ी खींची और ब्लाउज के बटन खोले। उसके स्तन बाहर निकल आए, भारी और कोमल। मैंने एक निप्पल मुंह में लिया और चूसने लगा। राधा सिसकारियां ले रही थी, “आह विक्रम, चूसो ना, मेरे स्तन दूध से भर जाएंगे तुम्हारे लिए।”
मैंने दूसरा स्तन भी चूसा, काटा और चाटा। राधा का हाथ मेरे लंड पर था, वो पैंट के ऊपर से ही मसल रही थी। “लंड निकालो ना, देखूं कितना बड़ा है।” मैंने पैंट उतारी। मेरा लंड फनफना कर खड़ा था, सिरा चमक रहा था और प्री-कम टपक रहा था। राधा ने उसे हाथ में लिया, “वाह, इतना मोटा लंड! गांव के लड़कों का तो पतला होता है।” उसने जीभ से सिरे को चाटा और फिर पूरा मुंह में ले लिया। वो जोर-जोर से चूस रही थी, “चुप-चुप की आवाजें आ रही थीं।” मैं उसके बाल पकड़कर मुंह चोद रहा था, “ले राधा, पूरा लंड निगल ले, तेरी देहाती चूत के लिए तैयार कर।”
उसने मेरे अंडों को भी चाटा और चूसा। फिर मैंने उसे लिटाया। साड़ी पूरी उतार दी। उसकी चूत साफ थी, बाल कटे हुए, होंठ मोटे और गुलाबी, रस बह रहा था। मैंने उंगलियां डालीं, “राधा तेरी चूत कितनी गीली है।” वो कराह रही थी, “उंगली डालो विक्रम, और गहरी।” दो उंगलियां अंदर गईं, फिर तीन। मैं चाटने लगा, उसकी चूत का स्वाद खट्टा-मीठा था। राधा चीख रही थी, “आह… चाटो मेरी चूत, जीभ डालो अंदर।”
मैंने अपना लंड उसकी चूत पर रगड़ा। सिरा फिसल रहा था रस में। “डालो ना विक्रम, फाड़ दो मेरी चूत।” एक जोर का झटका मारा। आधा लंड अंदर घुस गया। राधा चीख पड़ी, “अरे मां… कितना मोटा है, धीरे से।” मैंने धीरे-धीरे धक्के मारे, पूरा लंड अंदर ले लिया। उसकी चूत गरम और टाइट थी, दीवारें लंड को निचोड़ रही थीं। हम दोनों जोर-जोर से चोदने लगे। “चोदो मुझे, गांव की चूत को शहर वाले लंड से फाड़ो।”
पोजीशन बदली। राधा कुत्ते वाली मुद्रा में हो गई। मैं पीछे से लंड डालकर चोद रहा था, उसकी मोटी गांद पर थप्पड़ मार रहा था। “थप्पड़ मारो, और जोर से चोदो।” गांद लाल हो रही थी। लंड अंदर-बाहर हो रहा था, रस निकलकर जांघों पर बह रहा था। फिर वो ऊपर आई, मेरे लंड पर बैठ गई। वो उछल-उछल कर चोद रही थी, उसके स्तन उछल रहे थे। मैंने उन्हें पकड़कर दबाया। “रस निकाल दो राधा, मेरे अंडों में भर दो।”
हम घंटों चोदते रहे। लोकगीत की धुन अभी भी कानों में गूंज रही थी। राधा चीख-चीख कर झड़ रही थी, “आ गया विक्रम, चूत से रस निकल रहा है।” मैंने भी अंत में जोर से झटके मारे और उसकी चूत में झड़ गया। गरम-गरम वीर्य भर दिया। हम दोनों पसीने से तर थे, सांस फूल रही थी।
रात भर हमने और चोदा। सुबह होने पर राधा ने कहा, “कल फिर मिलना, और dehati gana lokgeet सुनाऊंगी, साथ में चुदवाऊंगी।” मैं वापस लौटा, लेकिन वो रात मेरी यादों में हमेशा ताजा है। देहाती गानों की मिठास अब मेरे लंड को हमेशा याद दिलाती है।