नमस्ते दोस्तों, मेरा नाम राहुल है। मैं दिल्ली का एक आम लड़का हूँ, २८ साल का, अच्छी नौकरी, फ्लैट और गाड़ी सब कुछ है। लेकिन जिंदगी में कुछ नया चाहिए था तो मैं छुट्टियों में अपने नाना के गाँव चला गया। गाँव का नाम था बड़ौदा, उत्तर प्रदेश में। पहुँचते ही गर्मी, धूल और हरियाली ने घेर लिया। एक शाम खेतों के पास टहल रहा था कि मेरी नजर एक लड़की पर पड़ी। नाम था मीरा, २२ साल की, गाँव की सबसे सुंदर लड़की। गोरी नहीं लेकिन उसकी त्वचा सांवली और चमकदार थी, मोटे स्तन जो ब्लाउज में फटे पड़ते थे, चौड़ी कमर और मोटी जांघें जो चोली-घाघरा में लहराती थीं।
मीरा पानी भरने जा रही थी। मैंने बात शुरू की, “भई, गाँव में नया हूँ, राहुल।” उसने शरमाते हुए जवाब दिया, “मीरा हूँ।” धीरे-धीरे दोस्ती हुई। रोज शाम को खेतों के किनारे मिलना शुरू हो गया। बातें बढ़ीं तो पता चला कि उसका मन भी शहर की जिंदगी देखने को तरस रहा था। एक रात बारिश शुरू हो गई। हम दोनों एक पुराने खेत के झोपड़े में छुप गए। अंधेरा था, बारिश की आवाजें आ रही थीं। मीरा काँप रही थी। मैंने उसे अपनी बाहों में लिया। “ठंड लग रही है क्या?” मैंने पूछा। उसने सिर हिलाया। मेरे हाथ उसके स्तनों पर चले गए। ब्लाउज के ऊपर से ही मैंने दबाया तो वो सिसकारियाँ लेने लगी। “राहुल, क्या कर रहे हो… गाँव में कोई देख लेगा।” लेकिन उसकी आवाज में इजाजत थी।
मैंने ब्लाउज के बटन खोले। उसके स्तन बाहर निकल आए, भारी और काले निप्पल वाले। मैंने एक को मुंह में लिया और चूसने लगा। मीरा का हाथ मेरे लंड पर चला गया जो पैंट में खड़ा हो चुका था। “अरे, इतना बड़ा… शहर वाले लड़के ऐसे ही होते हैं क्या?” उसने फुसफुसाया। मैंने उसकी साड़ी ऊपर खींची, पेटीकोट के नीचे हाथ डाला। उसकी चूत पहले से ही गीली थी। उंगलियां फेरते ही “आह्ह… राहुल, धीरे…” की आवाज निकली। मैंने दो उंगलियां अंदर डालीं और घुमाने लगा। उसका रस बह रहा था, मेरी उंगलियां चिपचिपा हो गईं।
मीरा ने मेरी पैंट खोली और लंड बाहर निकाला। “कितना मोटा और लंबा है तेरा लंड… मेरे गाँव वाले लड़के ऐसे नहीं होते।” उसने उसे हाथ में लिया और ऊपर-नीचे करने लगी। फिर मुंह में ले लिया। जीभ से चाटते हुए चूस रही थी। “चूस ले पूरी, गाँव की रानी” मैंने कहा। वो जोर-जोर से चूस रही थी, थूक से लंड चमक रहा था।
फिर मैंने उसे झोपड़े की मिट्टी पर लिटा दिया। घाघरा ऊपर किया, चूत सामने थी, बालों वाली और फूली हुई। मैंने अपना लंड उसके मुंह के पास रखा। “चूस और थूक लगा”। उसने थूक लगाया। मैंने उसके पैर फैलाए और लंड चूत पर रखा। “देख, अब शहर वाला लड़का गांव की चूत फाड़ने वाला है।” एक झटका मारा तो आधा अंदर चला गया। “आह्ह्ह… दर्द हो रहा है… धीरे राहुल!” मीरा चीख पड़ी। मैंने रुककर उसकी गांद दबाई, फिर दूसरा झटका। पूरा लंड अंदर घुस गया। चूत का रस निकल रहा था, मेरे लंड पर सफेद झाग बन रहा था।
मैं जोर-जोर से चोदने लगा। “तेरी चूत कितनी टाइट है मीरा… गांव की चूत मस्त होती है।” वो चीख रही थी, “चोदो मुझे… और जोर से चोदो… मेरी चूत फाड़ दो!” मैंने उसके स्तनों को मसलते हुए रफ्तार बढ़ाई। हर झटके पर “प्लॉप प्लॉप” की आवाज आ रही थी। बारिश और तेज हो गई थी। मीरा ने मेरी पीठ पर नाखून गड़ाए। “राहुल, मैं झड़ने वाली हूँ… अंदर ही निकाल!” मैंने और तेज चोदा। उसकी चूत कस गई और गरम रस निकला, मेरे लंड को नहला दिया।
मैंने लंड बाहर निकाला, उसकी गांद पर थूक लगाया और उंगली डाली। “अब गांद मारूं?” “हां, मार… आज पूरी रात मार”। मैंने लंड गांद में घुसाया। वो और भी टाइट थी। “आह्ह… जलन हो रही… लेकिन मस्त लग रही है!” धीरे-धीरे पूरा अंदर किया। फिर जोर-जोर से धक्के लगाने लगा। गांद लाल हो रही थी, मेरे हाथों के निशान पड़ रहे थे। मीरा चीख-चीख कर बोल रही थी, “चोद गांद… शहर वाले लंड से चोद… मैं तेरी गुलाम हो गई!”
हमने तीन बार चोदा उस रात। पहली बार चूत में, दूसरी बार गांद में, तीसरी बार वो मेरे ऊपर चढ़ी और लंड पर कूदने लगी। उसके स्तन उछल रहे थे, पसीना बह रहा था। “राहुल, तेरा लंड मेरी जान है… रोज चोदना!” आखिरी बार हम साथ झड़े। मेरा गरम पानी उसकी चूत में भर गया, रस बाहर निकल रहा था।
सुबह होने पर हम अलग हुए लेकिन अगली रात फिर मिले। पूरे हफ्ते यही सिलसिला चला। मीरा अब खुलकर गंदी बातें करती, “राहुल, तेरे लंड का स्वाद मेरे मुंह में रहता है।” मैंने उसे दिल्ली बुलाया लेकिन वो गाँव में ही रहना चाहती थी। आखिरी दिन विदा लेते वक्त हमने झोपड़े में फिर चोदा। उसकी चूत और गांद दोनों लाल हो चुकी थीं, मेरे लंड पर उसके रस के निशान थे।
अब जब भी गाँव जाता हूँ, मीरा इंतजार करती है। शहर की लड़कियां अलग हैं, लेकिन गाँव की चूत का मजा ही कुछ और है। वो रातें कभी भूल नहीं पाता।