नमस्ते दोस्तों, मेरा नाम रोहन है। मैं दिल्ली में नौकरी करता हूँ लेकिन असली जड़ें मेरी उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव में हैं। हर साल गर्मियों में मैं गांव जाता हूँ परिवार से मिलने। इस बार भी गया था जब मेरी जिंदगी का सबसे मजेदार और गंदा वाकया हुआ। गांव में एक लड़का रहता था, नाम था विक्रम। लोग उसे प्यार से “комедия парень с нашей деревни” कहते थे क्योंकि वो हमेशा मजे लेता, चुटकुले सुनाता और सबको हंसाता। लेकिन उसकी असली मस्ती तो बिस्तर पर थी, ये मुझे बाद में पता चला।
विक्रम की उम्र मेरे बराबर ही थी, पच्चीस के आसपास। वो कद में थोड़ा छोटा लेकिन तगड़ा था, गांव की मेहनत से उसकी छाती चौड़ी और हाथ मोटे थे। उसकी हंसी में कुछ ऐसा जादू था कि लड़कियां भी पीछे घूमतीं। एक शाम बारिश हो रही थी। बिजली गुल हो गई थी। मैं अपनी पुरानी हवेली के आंगन में बैठा था जब विक्रम आया। “अरे रोहन भाई, अकेले क्या कर रहा है? चल, मेरे साथ ऊपर छत पर चल, हवा खाते हैं।” उसकी आवाज में हमेशा की तरह शरारत थी।
हम दोनों छत पर चढ़ गए। बारिश रुक चुकी थी लेकिन हवा ठंडी चल रही थी। विक्रम ने एक पुरानी चादर बिछाई और हम लेट गए। बातें शुरू हुईं। पहले गांव की पुरानी बातें, फिर धीरे-धीरे सेक्स की। विक्रम हंसते हुए बोला, “भाई, गांव की लड़कियों की गंदी आदतें देखी हैं? रात को अकेले कितना मस्ती करती हैं।” मैंने पूछा, “तू कैसे जानता है?” वो मुस्कुराया, “देख लिया है ना कई बार।”
उसकी बातें सुनकर मेरा लंड खड़ा होने लगा। विक्रम ने नोटिस कर लिया। “अरे वाह, भाई का लंड खड़ा हो गया। चल, दिखा।” मैं शरमा गया लेकिन विक्रम ने खुद अपनी पैंट खोल दी। उसका लंड मोटा और काला था, नसें उभरी हुई, सिरा चमक रहा था। “देख, मेरा कितना तगड़ा है। गांव की कोई भी लड़की इसे देखकर पानी छोड़ देती है।”
मैं भी अपनी पैंट उतार दी। हम दोनों नंगे लेटे थे। विक्रम ने मेरा लंड पकड़ लिया। “भाई, तेरा भी बढ़िया है। चल, एक दूसरे को मस्ती करवाते हैं।” उसने अपना मुंह मेरे लंड पर रखा और चूसने लगा। उसकी जीभ लंड के नीचे घूम रही थी, लार टपक रही थी। “आह… विक्रम, और जोर से चूस।” मैं कराह उठा।
विक्रम ने मेरा लंड पूरा मुंह में लिया। उसकी गर्म सांसें लग रही थीं। मैंने भी उसका लंड हाथ में लिया। वो मोटा था, हाथ भर में नहीं आ रहा था। मैंने आगे-पीछे करना शुरू किया। विक्रम बोला, “हां भाई, ऐसे ही। अब मेरी गांड चाट।” वो पलट गया, अपनी मोटी गांड मेरे मुंह के सामने कर दी। गांड के छेद से हल्की सी बदबू आ रही थी, लेकिन वो मुझे और उत्तेजित कर रही थी। मैंने जीभ निकालकर उसके छेद पर लगाई। विक्रम चीख पड़ा, “आह… रोहन, गांड चाट, और अंदर डाल जीभ।” मैंने जीभ घुसा दी, वो कस के सिकुड़ रहा था।
फिर विक्रम ने मुझे पीठ के बल लिटाया। “अब मेरी बारी। तेरी गांड फाड़ता हूं।” उसने थूक लगाकर अपना लंड मेरी गांड पर रखा। धीरे से दबाया। दर्द हुआ लेकिन मजा भी। “आह… विक्रम, धीरे… मेरा पहला बार है।” वो हंसा, “комедия парень स нашей деревни कभी धीरे नहीं करता।” और जोर से धक्का मारा। उसका आधा लंड अंदर घुस गया। मैं चीख उठा। विक्रम ने आगे-पीछे करना शुरू किया। “ले, ले मेरा लंड। तेरी गांड कितनी तंग है भाई।”
हम दोनों पसीने से तर हो गए थे। विक्रम का लंड मेरी गांड में अंदर-बाहर हो रहा था। हर धक्के पर उसकी गेंदें मेरी गांड से टकरा रही थीं। “हां… और जोर से चोद… विक्रम, मुझे तेरे लंड का नशा हो गया।” मैं बड़बड़ा रहा था। विक्रम ने मेरी छाती पर हाथ रखा और जोर-जोर से चोदने लगा। “ले, गांड फाड़ दूंगा। गांव में सबको बता दूंगा कि दिल्ली वाला रोहन मेरी गांड में लंड लेता है।”
हम घंटे भर तक चोदते रहे। विक्रम ने मुझे अलग-अलग पोजीशन में डाला। एक बार मैं उसके ऊपर चढ़ गया, उसका लंड अपनी गांड में लिया। वो मेरी कमर पकड़कर ऊपर उठा रहा था। “आह… विक्रम, मेरा लंड भी चूस।” उसने मेरा लंड मुंह में लिया और चूसते हुए मेरी गांड मारता रहा।
आखिर में विक्रम बोला, “भाई, अब निकालता हूं। तेरे मुंह में डालूं?” मैंने हां कहा। वो बाहर निकला, मेरा मुंह खोला और गरम-गरम रस मेरे मुंह में छोड़ दिया। स्वाद नमकीन और गाढ़ा था। मैंने सब पी लिया। फिर मैंने भी अपना लंड हिलाया और विक्रम की छाती पर रस छोड़ा।
हम दोनों थककर लेट गए। विक्रम हंसा, “अब समझा, क्यों मुझे комедия парень с нашей деревни कहते हैं? मजा आया ना?” मैंने कहा, “बहुत आया। अगली बार फिर मिलेंगे।”
वो रात भर हम बातें करते रहे, नंगी हालत में। सुबह होने पर विक्रम चला गया लेकिन अगले दिनों में हम कई बार मिले। हर बार नई पोजीशन, नई गंदी बातें। गांव की हवा में वो मस्ती आज भी याद आती है।
(कहानी जारी रखते हुए विस्तार: अगले दिन विक्रम ने मुझे अपने घर बुलाया। उसकी मां बाजार गई थी। हम अकेले थे। विक्रम ने कहा, “आज तेरी गांड नहीं, तेरी चूत जैसी मस्ती करवाता हूं।” उसने मुझे कुर्सी पर बैठाया, मेरे पैर फैलाए और अपना लंड मेरी गांड में घुसा दिया। इस बार और जोर से। “ले, रोहन, गांड का रस निकाल दूंगा।” उसकी हर धक्के से कुर्सी हिल रही थी। मैं कराह रहा था, “विक्रम, तेरे लंड से मेरी गांड फट रही है। और गहराई तक मार।”
विक्रम ने मेरी टांगें अपने कंधों पर रखीं और पूरा लंड अंदर डाल दिया। “देख, कितना अंदर गया। तेरी गांड अब मेरी हो गई।” हम दोनों का पसीना एक दूसरे के शरीर पर गिर रहा था। विक्रम ने मेरी निप्पल चूस ली, काट ली। दर्द और मजा दोनों हो रहा था।
फिर हम फर्श पर लेट गए। विक्रम ने मुझे उल्टा कर दिया, मेरी गांड ऊपर करके चोदने लगा। “हां, ऐसे ही उठा गांड।” उसकी गेंदें मेरी जांघों से टकरा रही थीं। “विक्रम, अब निकाल, मैं झड़ने वाला हूं।” लेकिन वो नहीं माना। “पहले मैं झड़ूं।” और जोर से धक्के मारे। उसका गरम रस मेरी गांड में भर गया।
उसके बाद मैंने विक्रम को पीठ के बल लिटाया। उसकी मोटी गांड में अपना लंड डाला। वो चीखा, “आह… रोहन, तेरा लंड भी मोटा है। गांड फाड़ दे।” मैंने जोर से चोदा। विक्रम की गांड लाल हो गई थी। हम दोनों एक साथ झड़ गए।
ये सिलसिला पूरे हफ्ते चला। हर रात नई जगह, नई स्टाइल। कभी खेत में, कभी नहर के किनारे। विक्रम की गंदी बातें और उसका तगड़ा लंड मुझे पागल किए हुए था। गांव लौटने से पहले आखिरी रात हमने पूरी रात चोदाई की। विक्रम बोला, “अब जब भी गांव आएगा, सीधा मेरे पास आना। तेरी गांड मेरी इंतजार करेगी।”
मैं दिल्ली लौट आया लेकिन वो यादें अभी भी ताजा हैं। комедия парень स нашей деревни ने मुझे वो मजा दिया जो शहर की कोई लड़की नहीं दे सकती।